रैन-बसेरे के बाशिंदे और हम…

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जब मुझे हमारे रैन-बसेरे के एक्सपीरियंस को शब्दों में बयां करने को कहा गया तो मेरे दिमाग में जैसे सोच की चिंगारी जली और मिसाइल की भाँति चहुँ-ओर छूटने लगी ।
मैं चार लाइनें लिखती और तीन काटती । कभी लगता मैं शेल्टर-होम की ज़िन्दगी को एक्सोटिसाइज़ कर रही हूँ, तो कभी ग्लोरिफाई । मुझे सबसे बड़ी दिक्कत इस बात से थी कि आर्टिकल को आख़िर किस वॉयस में लिखूँ । मैं अपने नज़रिए से किसी और की ज़िन्दगी के बारे में लिखने से कतरा रही थी ।

पहली बार मुझे किसी लेख को लिखने में इतनी जद्दोज़हद करनी पड़ी। ये लिखना इतना मुश्किल इसलिए था क्यूँकि मैं एक ऐसी जगह के बारे में लिख रही थी जहाँ की कल्पना भी हम नहीं करना चाहते। और यहाँ तो शेल्टर के साथ वहाँ बसने वाले लोगों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का भी उल्लेख करना था।

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जिस रैन-बसेरे के बारे में अब तक बस सुना और पढ़ा था आज वहाँ जाने की बारी थी । हमें तब तक बस इतना पता था की यह एक ऐसा स्थान है जहाँ बेघर हुए लोगों को रहने दिया जाता है। इतनी सी इनफार्मेशन से मेरे मिडिल-क्लास इमैजिनेशन ने झट से एक दुःखी सी तसवीर स्केच की।आख़िर कैसी होगी वो जगह, जहाँ घर अपना नहीं, लोग एक दूसरे को जानते नहीं, खाने को रोटी नहीं, पहनने को कपड़ा नहीं और कमाई का साधन लोगो से मिली भीख हो? मेरे ज़हन में वहाँ की औरतें रोती-बिलखती, अबला और मजबूर थी जिनके साथ ज़िन्दगी ने बहुत ही बुरा किया था।मैंने अपने मन को समझाया, खुदको ढांढस बंधाया और चल पड़ी अपने दोस्तों के साथ।

पर जब हम वहाँ  पहुँचे तो एक बड़े से मैदान के एक छोर पे दिखे २ नीले टिन के ढाँचे। खिड़की से एक लड़की झाँक रही थी, हमें देखते ही बोली “दीदी अंदर आ जाओ।”
कम्पाउंड के अंदर घुसते ही हमें दिखे खिलखिलाते बच्चे जो कि बड़े मज़े से दौड़ा-दौड़ी खेल रहे थे। और एक बड़ी सी मुस्कराहट के साथ कुछ औरतों ने हमें अंदर बुलाया । मेरे मनगढंत रैन-बसेरे की तस्वीर से ये तो बिलकुल उल्टा था। यहाँ मेरे सामने खड़ी थीं ज़िंदादिली से भरपूर, हॅंसी-मज़ाक करती औरतें।

हमें देखते ही वह हमसे बातें करने लगीं। अपने बारे में बताने लगीं । कैसे उन्हें पेंटिंग, डांस, नाटक इत्यादि सीखाने लोग आते हैं । एक ने तो उनसे अभिनय भी करवाया था। उस टिन के ढाँचे के अंदर, गोल गोल घूमते फैन के नीचे खड़ी मैं, आसपास नज़रें दौड़ाने लगी । एक बड़ा सा हॉल था, जिसमें चार बड़ी खिड़कियाँ थीं और जिनसे झांको तो जामा मसजिद दिखता था, दीवारों पर सुन्दर कलाकृतियाँ बनी थी, एक बड़ा सा टीवी और कुछ तसवीरें लटकी हुई थी। काफी साफ़-सुथरा था उनका घर।

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रैन-बसेरे को आज जब नज़दीक से देखा तो पता चला की वहाँ कोई अकेला नहीं, सब एक कुटुंब के तरह रहते हैं। और हर विपत्ति का सामना अपनी मुस्कराहट से करते हैं । क्यूँकि हँसकर सामना करें तो विपत्ति भी घबरा जाती है ।

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This oppurtunity to visit the Rain-basera was given to us by famous artist Sreejata Roy who runs an art project with the women in the Rain-basera (Shelter home). The art produced by them is being merchandised in the form of various products like notebooks etc.

लेख व फोटो कर्टसी : पल्लवी

7 comments Add a comment

  1. Great work team. Taking out time for this noble cause, visiting such places to know that there still prevails joy and happiness among people in such shelter homes in the midst of all their hardships.
    God bless. Many more miles to go!!

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